- शिव- भक्त श्री बसवेश्वर जी की 891 वीं जयंती

महान दार्शनिक, धर्म प्रसारक और समाज सुधारक थे जिन्होंने १२वीं शताब्दी में चालुक्य साम्राज्य के क्षेत्र में काम किया था | उनका जन्म उस समय के इंगलेश्वर-बागेवाड़ी और आज के कर्नाटक राज्य के बसवन्ना-बागेवाड़ी (जि. बीजापुर/विजयपुर) में रहनेवाले एक कर्मठ शैव (शिव की पूजा करनेवाले) ब्राह्मण परिवार में ईसा वर्ष ११३१ में भारतीय/सनातन पंचांग के अनुसार वैशाख शुद्ध तृतीया के दिन हुआ था |श्री बसवेश्वर जी 12 वीं सदी के एक भारतीय दार्शनिक, राजनेता और एक समाज सुधारक थेआचार्य श्री बसवेश्वर जी शैव मत इतिहास की धारा में बारहवीं सदी का महान शैव संत आचार्य वर्षभेंद्र ( बसवेश्वर ) जी के जन्म कर्णाटक के इंगलेश्वर गांव में आराध्य ब्राह्मण ( लिंगी ब्राह्मण ) माता मादलाम्बिका पिता मादरस से वैशाख शुक्ल रोहिणी नक्षत्र अक्षय तृतीया ११३४ में हुआ है। बसवेश्वर जी के जीवनकाल धार्मिक -युग सच्चे अर्थों में ‘स्वर्ण-युग’ कहलाता है। इस कालखंड में विशेष था शैव मत के कवि-कवियित्रियों ने जो शिवशरण और शिवशरणियाँ कहलाते हैं, कविता की रचना सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक एवं शैव दर्शन को सहज मात्र भाषा कन्नड़ में जनसामन्य लोगो को पहुँचाने के लिए की है।काव्यकर्म इनके लिए साधन मात्र था, न कि साध्य। लगभग सैकड़ों शरण (संत ) कवि-कवयित्रियों ने समकालीन काल संदर्भ में, व्यष्टि और समष्टि हित को समान रूप से महत्व देते हुए, वचन साहित्य की रचना की थी। आज भी लगभग सैकड़ों शिवशरण और ७७ से बढ़कर शिवशरणियों का वचन साहित्य उपलब्ध होना आश्चर्य का कारण बन सकता है। उन्होंने हमेशा सनातन (हिन्दू) धर्म की जाति व्यवस्था और अनुष्ठान के साथ-साथ सामाजिक भेदभाव का विरोध किया | उनका विश्वास केवल एक ईश्वर में था जो निर्गुण और निराकार है | सही मायनों में उन्होंने लिंगायत संप्रदाय/धर्म के अनुयायियों में एकेश्वरवाद (Monotheism) का बीजा बोया |स्त्री मुक्ति, जातिवाद का नाश, धर्म के क्षेत्र में शैवतंत्र ( लोकमत ) की स्थापना, श्रम संस्कृति की श्रेष्ठता एवं सब प्रकार की समानता, कथनी करनी का सुन्दर समन्वय, मनुष्य केन्द्रित जीवन चिंतन इनके काव्य की प्रमुख आवाज थी। समानता ही इनके लिए योग था।इसलिए विश्वास भरी एवं ऊँची आवाज में यह कहा जा सकता है कि विश्व साहित्य पंक्ति में वीरशैव के वचन साहित्य को खुले दिल से रखा जा सकता है। आचार्य वर्षभेंद्र (बसवेश्वर ) जी के जीवन और लेखन एवं कृति और कार्य में सुन्दर समन्वय देखा जा सकता है। इसीलिए इनके काव्य में जीवन को देखने की प्रामाणिकता थी और काव्यदृष्टि स्वस्थ थी। इन्होंने जो भी अनुभव किया, उसे वाणी में अभिव्यक्त किया, जो भी अभिव्यक्त किया वही जीवन दर्शन बन गया, उनका जीवन दर्शन ही काव्य दर्शन था और वही उनकी जीवन शैली भी थी। श्री बसवेश्वर जी काल के लगभग सभी शरण निम्न जाति और निम्न वर्ग के थे। सब वृत्तियों के लोगों ने इस काव्य कर्म में भाग लिया था, जैसे मोची ढोर, धोबी, हज़्ज़ाम, हरिजन लकड़ी बेचने वाला, रस्सी बनाने वाला किसान, नट, गायक, चावल कूटने वाला आदि। यहाँ तक कि वेश्या सूले (वेस्या ) संकव्वे जैसी महिला भी मनपरिवर्तन से शिवशरणी बनी थी और उसने भी वचन की रचना की थी। इतनी बड़ी संख्या में और विशाल आयामों से आये हुए लोग एक स्थान में, एक समय में, एक ही सामाजिक हित के लिए मिलकर आत्मशुद्धि एवं समाजशुद्धि के लिए साहित्य की रचना की है, जो दुनिया के \ सांस्कृतिक और साहित्यिक लोक में दुर्लभ है।विश्व चिंतन लोक के लिए अनुभव मंटप की परिकल्पना आचार्य वर्षभेंद्र जि के है बारहवी सदी के बसवण्णा (आचार्य वर्षभेंद्र ) जी और शिवशरणों की इस अनुभव मंटप की महान देन है . इसे सक्रोटीस की चर्चा समिति और आधुनिक समानताओं की स्थापना के लिए निर्मित पार्लियामेंट से श्रेष्टतम अनुभव मंच कहा जा सकता है समसंस्कृतिक की श्रेष्ठता , दासोह भाव की उपयोगिता एवं अध्यातम जीवन की स्थापना के लिए स्थापित शिवशरणों का अनुभव मंटप अनुपम विद्वानों का केंद्र रहा ,इस धरती की मिट्टी से समन्वित विद्वानों की मंडली था अध्यात्म और धर्म को यथार्थ में रूपांतरित करने के लिए शिवशरणों ने अनुभव मंटप की स्थापना की शिवशरणों में प्रमुख बसवेश्वर , (आराध्य शैव ) अक्का महादेवी (बनाजिग और (स्त्री)) निलंभिका (ब्राहमण और (स्त्री), , अक्क नागम्मा, (ब्राहमण और (स्त्री), चन्न बसवण (ब्राह्मण) , सिद्धराम (शिल्पकार ) , अलम प्रभु (पत्रिका) और माडीवळ माचिदेव (धोभी ) नूलागी चंदय्या (कपडे सिने ) अंभिगार चौड़य्या (नाविक) हरलय्या (चमार) ऐसे विविद प्रकार के वर्ती और वर्ण के शिव शरणों ने कन्नड़ भाषा में पांच वर्षो के साहित्यिक अध्यात्मिक और धार्मिक इतिहास में पहली बार निम्न जाती , निम्न वर्ग के नाम जीवी साहित्य की रचना कर रहे थे अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य भोग रहे थे शुद्र वर्ग और स्त्री वर्ग अभेद भाव से लेखेनी चलाराहे थे आश्चर्य य है की ५३० शरण और १०० अधिक शरणीओं उस अनुभव मंटप में भाग लेते थे कहा जाता है की इस अनुभव मंटप में भारत के कोने कोने से शिव भक्त लोग आते थे अपने अध्यात्म अनुभव को व्यक्त करते थे उस समय जो अध्यात्म गोष्टी की गयी है वो आज भी ग्रंथ रूप में उपलब्ध है लेकिन भारतीय/सनातन पंचांग के अनुसार उनकी जयंती हर वर्ष अक्षय तृतीया के दिन पर ही मनाई जाती है | उनका देहांत ईसा वर्ष ११९६ में उनकी ६५ वर्ष की आयु में हुआ और भारत के कुडल संगम में ही उनकी एक समाधी बनाई गयी है |

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