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एम्स दिल्ली की एक और सफलता, ऐसी मशीन बना दी जो आधे घंटे में ही भर देगी जख्म
नई दिल्ली । एम्स की डेवेलप की गई मशीन अब जख्मों को भरने का काम करेगी। घाव पर बार बार पट्टी बदलने की जरूरत नहीं होगी और दर्द से छुटकारा मिलेगा। यही नहीं पट्टी की तुलना में जख्म आधे समय मे ही भर जाएगा। मंगलवार को एम्स ने अपनी इस नई मशीन को तीसरे एनुअल रिसर्च डे पर प्रेजेंट किया। एम्स का दावा है कि यह मशीन मार्केट में आने के लिए तैयार है। इसे सभी तरह के रेगुलेटरी अप्रूवल मिल चुके हैं। एम्स ट्रॉमा सेंटर के सर्जिकल विभाग की प्रफेसर डॉ. सुषमा सागर ने बताया कि स्कूल ऑफ इंटरनेशनल बायो डिजाइन के साथ करार के तहत दो फेलोज ने एम्स ट्रॉमा सेंटर में जॉइन किया था। दोनों ने टेक्नोलॉजी गैप का आकलन किया और इस मशीन का इजाद किया।
उन्होंने कहा कि बड़े जख्मों में और डायबिटीज के मरीज को बार बार पट्टी बदलने में दिक्कत और उन्हें दर्द होता है। मशीन से इन समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा। डॉ. सुषमा ने कहा कि यह मशीन अपने दोनों ट्रायल में सफल रही। साथ ही यह पाया कि जिन मरीजों में जख्म भरने में एक दो महीने तक लग जाते थे, अब वह जख्म 15 से 20 दिनों में भर जा रहे हैं। औसतन 50 परसेंट समय कम लग रहा है। डॉ. सुषमा ने बताया कि एक मशीन का इस्तेमाल एक मरीज पर होता है। जहां पर जख्म होता है, वहां पर ट्यूब लगा पार्ट जख्म पर चिपका दिया जाता है। यह मशीन निगेटिव प्रेशर देती है। मशीन में एक कंटेनर लगा रहता है।
यह ट्यूब जख्म से निकलने वाले पस को खींच लेती है और कंटेनर में मौजूद केमिकल उसे सॉलिड बना देता है। दूसरा ट्यूब बाहर से जख्म तक ऑक्सीजन पहुंचाता है, ऑक्सीजन जख्म भरने में मदद करता है। इससे पस का रिसाव नहीं हुआ, मैन पावर कम लगी, मरीज को दर्द नहीं हुआ है। जख्म की वजह से जो ब्लड वेसेल्स बंद हो जाते हैं, वह भी खुल जाते हैं। उन्होंने बताया कि रेगुलेटरी अप्रूवल मिल चुका है, पेटेंट हो गया है। सेफ्टी लाइसेंस क्लीयर है। इसे एथिकल कमेटी ने पास कर दिया है। कुछ अस्पताल इसे इस्तेमाल कर रहे हैं।
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