- **तृणमूल पर किसका दावा होगा?** ममता और ऋतब्रत गुट सोमवार को चुनाव आयोग के सामने पेश होंगे।

**तृणमूल पर किसका दावा होगा?** ममता और ऋतब्रत गुट सोमवार को चुनाव आयोग के सामने पेश होंगे।

विधानसभा चुनाव में हार के बाद TMC में हुई बगावत के चलते, पार्टी के नाम, संगठन के ढांचे और मशहूर चुनाव चिह्न पर अपना-अपना दावा पेश करने के लिए दो विरोधी गुट चुनाव आयोग के सामने पेश होने वाले हैं।

तृणमूल कांग्रेस अपनी शुरुआत के बाद से सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। पार्टी पर कंट्रोल की लड़ाई सोमवार को एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचने वाली है, क्योंकि दोनों विरोधी गुट चुनाव आयोग (EC) को दस्तावेज सौंपकर पार्टी के नाम, इसके मशहूर 'घास और फूल' वाले चुनाव चिह्न और संगठन के ढांचे पर अपना दावा पेश करेंगे। पार्टी के 28 साल के इतिहास में यह पहली बार है जब राजनीतिक मान्यता और संगठन पर कंट्रोल के लिए ऐसी लड़ाई हो रही है, जिसमें दोनों पक्ष खुद को "असली" तृणमूल कांग्रेस साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।

**विरोधी गुटों ने पेश किए अपने दावे**

पिछले हफ्ते विरोधी गुटों की शुरुआती दलीलें सुनने के बाद, चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को 6 जुलाई को शाम 5:30 बजे तक दस्तावेज, संगठन के रिकॉर्ड और समर्थन के सबूत जमा करने का निर्देश दिया। इस विवाद के केंद्र में पार्टी का चुनाव चिह्न, संपत्ति, फंड और मुख्यालय का भविष्य है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद हुई अंदरूनी बगावत के बाद दोनों गुटों ने इन पर अपना दावा पेश किया है।

**संगठन के लिए एक बड़ी चुनौती**

जहां ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले कालीघाट गुट के संगठन की निरंतरता और पार्टी की स्थापना की विरासत पर भरोसा करने की उम्मीद है, वहीं बागी गुट विधानसभा में चुने गए प्रतिनिधियों की संख्या बल पर भरोसा कर रहा है। यह टकराव पश्चिम बंगाल में हाल के दशकों में देखी गई सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में से एक के बीच हो रहा है। जो बात विधायी स्तर पर बगावत के तौर पर शुरू हुई थी, वह अब संगठन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।

**80 में से 58 विधायक अलग हुए**

संकट की शुरुआत पिछले महीने हुई जब बागी गुट ने एक विशेष सत्र बुलाया, वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को अध्यक्ष चुना और एक समानांतर राष्ट्रीय नेतृत्व ढांचा पेश किया। उन्होंने तर्क दिया कि पार्टी के मौजूदा नेतृत्व ने अपने अधिकांश चुने हुए प्रतिनिधियों का भरोसा खो दिया है। बागी नेताओं ने अपनी ताकत तब दिखाई जब 80 तृणमूल विधायकों में से 58 ने नेतृत्व के उम्मीदवार को खारिज कर दिया और विपक्ष के नेता के पद के लिए रिताब्रता बनर्जी की दावेदारी का समर्थन किया। इस गुट का दावा है कि उसे लगभग 65 विधायकों का समर्थन हासिल है।

**सांसदों ने भी की बगावत**
इसके बाद, काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में लोकसभा के 21 सदस्य 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया' (NCPI) में शामिल हो गए। इससे संसद में ममता बनर्जी की स्थिति काफी कमज़ोर हो गई और राजनीतिक वैधता की लड़ाई में एक नया मोड़ आ गया। शुक्रवार को पार्टी के अंदर चल रही खींचतान ने एक नाटकीय मोड़ ले लिया, जब बागी गुट ने कोलकाता में पार्टी मुख्यालय 'तृणमूल भवन' पर कब्ज़ा कर लिया। उन्होंने ताले बदल दिए, नए पोस्टर लगाए और घोषणा की कि अब से वे यहीं से काम करेंगे। यह कदम बागी गुट द्वारा नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार और दो चुनाव आयुक्तों से मिलकर पार्टी के नेतृत्व, चुनाव चिह्न, संगठनात्मक ढांचे और संपत्ति पर अपना दावा पेश करने के ठीक एक दिन बाद उठाया गया।

**दोनों पक्षों के क्या दावे हैं?**
ऋतब्रत गुट के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "हमने सभी दस्तावेज़ी सबूत जुटा लिए हैं और उन्हें आयोग के सामने पेश करेंगे। हमें भरोसा है कि फैसला तथ्यों, आंकड़ों और संगठनात्मक वैधता के आधार पर होगा।" दूसरी ओर, ममता बनर्जी खेमे ने बागी नेताओं के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है और कड़ी आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि पार्टी से निकाले गए नेताओं के पास चुनाव आयोग के सामने पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। फिर भी, कालीघाट खेमे के लिए दांव ऊंचे हैं, क्योंकि पार्टी के वरिष्ठ नेता निजी तौर पर मानते हैं कि चुनाव आयोग का फैसला पार्टी की भविष्य की राजनीतिक पहचान पर दूरगामी असर डालेगा।


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