महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, CISF ने एक 'फंक्शनल कमांड' (कार्यात्मक कमान) प्रणाली लागू की है। यह प्रणाली भौगोलिक क्षेत्र के बजाय उद्योग की प्रकृति पर आधारित है और 1 नवंबर 2026 से प्रभावी होगी। इसके बारे में विस्तार से नीचे जानें।
आज के दौर में, युद्ध अब केवल राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रह गए हैं। कोई दुश्मन देश, बिना किसी क्षेत्र पर कब्ज़ा किए ही, पावर ग्रिड, तेल रिफाइनरियों या बंदरगाहों जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर पूरे देश को पंगु बना सकता है। आज की इन चुनौतियों से निपटने और 'विकसित भारत' के लिए जरूरी औद्योगिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए, CISF ने अपनी सुरक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव किया है, जो 1 नवंबर 2026 से लागू होगा। गृह मंत्रालय की मंजूरी के बाद, CISF ने अपनी पुरानी 'भौगोलिक' (क्षेत्रीय) कमांड संरचना को बदलकर एक नई, अत्यधिक विशिष्ट 'फंक्शनल' (कार्यात्मक) सेक्टर प्रणाली अपनाई है।
यह नया बदलाव क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी?
पुरानी प्रणाली के तहत, CISF का एक सेक्टर मुख्यालय अपने निर्धारित क्षेत्र में 50 से अधिक विभिन्न प्रकार की इकाइयों की सुरक्षा की देखरेख करता था। इसका मतलब यह था कि एक ही अधिकारी को कोयला खदानों और बिजली संयंत्रों से लेकर बंदरगाहों तक, हर चीज की निगरानी करने की जिम्मेदारी दी गई थी। हालाँकि, कोयला खदान के सामने आने वाली सुरक्षा चुनौतियाँ, एक हाई-टेक बंदरगाह की चुनौतियों से बिल्कुल अलग होती हैं। आधुनिक खतरों—जैसे ड्रोन हमले, साइबर हमले (जो OT/ICS सिस्टम को निशाना बनाते हैं) और सुनियोजित तोड़फोड़—से निपटने के लिए ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता होती है, जिसे हर उद्योग की विशिष्ट तकनीकी बारीकियों की गहरी और सूक्ष्म समझ हो। इसे ध्यान में रखते हुए, अब सेक्टरों को उनकी भौगोलिक स्थिति के बजाय, प्रतिष्ठान की प्रकृति के आधार पर व्यवस्थित किया गया है।
आज से, ये नए कार्यात्मक कमांड (functional commands) पूरे देश में काम करना शुरू कर देंगे:
पावर सेक्टर: पावर-I (नई दिल्ली) और पावर-II (कोलकाता)
कोयला सेक्टर: रांची
इस्पात (स्टील) सेक्टर: भिलाई
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस सेक्टर: गुवाहाटी
पोर्ट (बंदरगाह) सेक्टर: पश्चिमी तट (मुंबई) और पूर्वी तट (चेन्नई)
सरकारी इमारतें, संग्रहालय, स्मारक और मेट्रो (GBMM और MRTS) सेक्टर: नई दिल्ली
यह तरीका बल (फोर्स) के लिए नया नहीं है। विमानन (एविएशन) सेक्टर 2001 से इसी कार्यात्मक मॉडल के तहत काम कर रहा है, और परमाणु ऊर्जा/अंतरिक्ष (DAE और DoS) सेक्टर 2018 से इसका पालन कर रहे हैं, जिसके बहुत अच्छे परिणाम मिले हैं। अब, पूरे बल को इसी सफल मॉडल के अनुसार व्यवस्थित किया गया है।
जमीनी स्तर पर सुरक्षा और मजबूत होगी, जबकि कार्य-प्रक्रियाएं पहले जैसी ही रहेंगी
क्या इस बड़े बदलाव से प्रवेश बिंदुओं (entry points) पर होने वाली रोज़मर्रा की सुरक्षा जांच में कोई फर्क पड़ेगा? CISF ने स्पष्ट किया है कि आम जनता और कर्मचारियों के लिए जमीनी स्तर की सुरक्षा प्रक्रियाएं (SOPs), गश्त (patrolling), और क्विक रिएक्शन टीमों (QRTs) की तैनाती पहले की तरह ही जारी रहेगी। यह बदलाव केवल 'पर्यवेक्षण' (supervision) के स्तर तक सीमित है। इससे वरिष्ठ अधिकारियों को अधिक सटीक मार्गदर्शन देने में मदद मिलेगी और किसी भी खतरे की स्थिति में, वे अपने-अपने सेक्टर से जुड़े 'आपातकालीन प्लान' (contingency plans) को तुरंत लागू कर सकेंगे।
नेतृत्व का क्या विज़न है? इस ऐतिहासिक बदलाव के फायदों पर प्रकाश डालते हुए, CISF के महानिदेशक ने कहा, "यह नई व्यवस्था कई हितधारकों (stakeholders) वाले माहौल में एक 'गेम-चेंजर' साबित होगी। पहला, इससे हमारे और संबंधित संस्थानों के प्रबंधन के बीच तालमेल (coordination) बहुत बेहतर हो जाएगा, क्योंकि अब दोनों पक्षों के बीच बातचीत के लिए एक ही संपर्क बिंदु (single point of contact) होगा। दूसरा, चूंकि नेतृत्व को संबंधित उद्योग की गहरी समझ होगी, इसलिए निर्णय लेने में होने वाली देरी खत्म हो जाएगी, जिससे किसी भी संकट की स्थिति में तुरंत और सटीक प्रतिक्रिया दी जा सकेगी। कुल मिलाकर, यह नया ढांचा बल के भीतर कार्यकुशलता, व्यावसायिकता और जवाबदेही के लिए नए मानक स्थापित करेगा।"
इस बदलाव के साथ, CISF अब केवल एक 'सुरक्षा बल' (guarding force) न रहकर, खुफिया जानकारी पर आधारित और तकनीकी रूप से उन्नत संगठन बन गया है। आधुनिक तकनीक, काउंटर-ड्रोन रणनीतियों और साइबर-फिजिकल सुरक्षा को प्रभावी ढंग से शामिल करके, CISF अब भारत के औद्योगिक विकास चक्र को किसी भी संभावित खतरे से सुरक्षित रखने के लिए पूरी तरह तैयार है। गौरतलब है कि हाल ही में CISF ने मुंबई हवाई अड्डे पर 1.83 करोड़ रुपये की कीमत वाली, अंडाकार आकार की तीन वस्तुएं बरामद की हैं।