समाजवादी पार्टी ने 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अयोध्या सीट से पवन पांडे को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। आइए उनके राजनीतिक सफ़र और छात्र राजनीति से विधायक बनने तक की यात्रा पर एक नज़र डालते हैं।
समाजवादी पार्टी ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए अपनी तैयारियां तेज़ कर दी हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बुधवार को लखनऊ में आयोजित एक ब्राह्मण सम्मेलन के दौरान अयोध्या सदर विधानसभा सीट के लिए पवन पांडे को उम्मीदवार घोषित किया। इस घोषणा के साथ ही पवन पांडे एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। वे न केवल अयोध्या में समाजवादी पार्टी के एक प्रमुख नेता के तौर पर जाने जाते हैं, बल्कि 2012 के विधानसभा चुनावों के दौरान अपनी शादी और चुनाव प्रचार से जुड़ी घटनाओं के लिए भी चर्चा में रहे थे।
**छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफ़र**
पवन पांडे ने लखनऊ विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और छात्र राजनीति से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। वे 1998 में समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। वे लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ की राजनीति में सक्रिय रहे और इसके उपाध्यक्ष भी बने। बाद में, वे अखिलेश यादव की युवा टीम के प्रमुख चेहरों में से एक बनकर उभरे।
2012 के विधानसभा चुनावों में, पवन पांडे ने अयोध्या सीट से वरिष्ठ भाजपा नेता लल्लू सिंह को हराकर बड़ी जीत हासिल की। इस जीत के बाद, उन्हें अखिलेश यादव सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया। हालांकि, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में उन्हें भाजपा उम्मीदवार वेद प्रकाश गुप्ता से हार का सामना करना पड़ा।
**जब शादी और चुनाव प्रचार एक साथ हुए**
पवन पांडे 2012 के चुनावों के दौरान भी सुर्खियों में रहे क्योंकि उनकी शादी 18 जनवरी, 2012 को तय हुई थी—उस समय विधानसभा चुनावों के लिए आदर्श आचार संहिता लागू थी। हालांकि शुरू में हज़ारों मेहमानों को बुलाने की योजना थी, लेकिन चुनाव आयोग के कड़े नियमों के कारण कार्यक्रम को छोटा करना पड़ा। आयोग ने शादी पर नज़र रखी और पूरे कार्यक्रम की वीडियोग्राफी करवाई ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि चुनाव प्रचार या मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिशों को लेकर कोई शिकायत न हो।
शादी के तुरंत बाद, पवन पांडे ने अपना चुनाव प्रचार फिर से शुरू कर दिया। इस दौरान, राजनीतिक हलकों और मीडिया में दूल्हे के अपनी दुल्हन के साथ चुनाव प्रचार करने की चर्चाएं भी खूब हुईं। उनके बारे में किस्से पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गए और लोग उन्हें उस नेता के तौर पर जानने लगे जिन्होंने अपनी दुल्हन के साथ चुनाव प्रचार किया था। शादी और चुनाव प्रचार का यह अनोखा मेल उस चुनाव की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक बन गया, जिससे पवन पांडे को एक अलग पहचान मिली।
**विवादों का इतिहास**
एमएलसी आशु मलिक के साथ मारपीट की एक घटना के बाद 2016 में पवन पांडे को समाजवादी पार्टी से निकाल दिया गया था। बाद में उन्हें पार्टी में वापस ले लिया गया और वे सक्रिय राजनीति में लौट आए। अभी वे समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं और अयोध्या व राम मंदिर जैसे मुद्दों पर पार्टी का पक्ष मजबूती से रखते हैं।
अखिलेश यादव ने अयोध्या सदर सीट के लिए एक बार फिर पवन पांडे पर भरोसा जताया है। माना जाता है कि अयोध्या में उनके मजबूत स्थानीय प्रभाव, संगठन में उनकी सक्रिय भूमिका और एक प्रमुख ब्राह्मण चेहरे के तौर पर उनकी पहचान की वजह से समाजवादी पार्टी ने उन्हें फिर से मैदान में उतारा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि पवन पांडे 2027 के चुनावों में 2012 वाली जीत को दोहराने में कितने सफल होते हैं।