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ज्यादा पैदावार देने वाले गेहूं-चावल की पौष्टिकता में 45 फ़ीसदी की कमी
नई दिल्ली । हरित क्रांति और उच्च पैदावार के लिए फसलों की जो नई-नई वैरायटी विकसित की गई। उससे फसल की पैदावार तो ज्यादा होने लगी। लेकिन उसकी पौष्टिकता में लगातार कमी आती चली गई। इंडियन कौंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चर रिसर्च, विधान चंद्र कृषि विश्वविद्यालय पश्चिम बंगाल तथा नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ न्यूट्रिशन तथा तेलंगाना के 12 वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से गेहूं चावल की नई प्रजाति की पौष्टिकता की जांच की है।
अध्ययन में पाया गया है, कि भारत के लोगों का मुख्य आहार गेहूं और चावल है। वर्तमान में जो गेहूं और चावल भोजन में उपलब्ध हो रहा है। 50 साल पहले जो गेहूं और चावल की पौष्टिकता थी। उसके मान से अब जो गेहूं और चावल उपलब्ध है। उसकी पौष्टिकता में 45 फ़ीसदी की कमी आई है। जिसके कारण लोग कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। फसलों में टॉक्सिक पदार्थ तथा बोरियम की मात्रा बढ़ी है। यदि यही कमी बनी रही, तो 2040 तक रोटी और चावल के आहार में पौष्टिकता बहुत कम हो जाएगी।
जिंक में 33 फ़ीसदी की कमी
गेहूं और चावल के उत्पादन में आयरन, जिंक,कैल्शियम और कॉपर की मात्रा का अध्ययन किया गया। जिंक और आयरन में 33 से लेकर 27 फ़ीसदी तक की कमी आई है। गेहूं में यह कमी 19 से 30 फ़ीसदी तक रही है।
संयुक्त अध्ययन में चावल की 16 तथा गेहूं की 18 प्रजातियों का अध्ययन किया गया है। अनाजों में पोषक तत्वों की कमी के कारण, भारत में कुपोषण की समस्या बढ़ी है। कैल्शियम, जिंक,आयरन कम मात्रा में उपलब्ध हो रहा है। जो पौष्टिक आहार की चिंता को बढ़ा रहा है। शरीर में काम पौष्टिक आहार होने के कारण बीमारियों के बढ़ने का खतरा भी स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। भारत में पहली बार तीन कृषि एवं पोषण संस्थाओं के वैज्ञानिकों ने मिलकर यह अध्ययन किया है। इसके परिणाम चौंकाने वाले हैं।
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