बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा है कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि वोटर लिस्ट (मतदाता सूची) का 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) हर छह महीने में हो। दुबे ने यह भी कहा कि SIR की परंपरा राजीव गांधी के कार्यकाल में शुरू हुई थी।
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच, बीजेपी नेता और सांसद निशिकांत दुबे ने एक अहम दावा किया है। झारखंड के देवघर से सांसद दुबे ने कहा कि नेहरू चाहते थे कि SIR हर छह महीने में हो।
दुबे ने बताया कि जब 1951-52 में चुनाव आयोग बना था, तब नेहरू चाहते थे कि SIR हर छह महीने में हो; लेकिन ज़्यादा खर्च की वजह से इसे हर पांच साल में करने का फैसला किया गया।
इसके अलावा, बीजेपी सांसद ने बताया कि SIR की परंपरा 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में हुए एक संशोधन के बाद शुरू हुई थी।
दुबे ने SIR को एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया बताया। उन्होंने कहा कि लिंगदोह (जेम्स माइकल लिंगदोह, तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त) के कार्यकाल के बाद इसे नहीं किया गया था, इसलिए अब जब ज्ञानेश कुमार इसका प्रस्ताव रख रहे हैं, तो चिंता की कोई बात नहीं होनी चाहिए।
**चुनाव आयुक्तों ने चुनाव लड़ा और गवर्नर बने: दुबे**
ECI से जुड़े विवाद पर बात करते हुए बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि रिटायरमेंट के बाद पूर्व चुनाव आयुक्तों को सरकारी पद दिए गए हैं। उन्होंने रमा देवी से लेकर टी.एन. शेषन तक कई उदाहरण दिए। दुबे ने बताया कि रमा देवी चुनाव आयुक्त रहीं और बाद में हिमाचल प्रदेश की गवर्नर बनीं; एम.एस. गिल कांग्रेस के मंत्री बने; और टी.एन. शेषन ने कांग्रेस के टिकट पर गांधीनगर से चुनाव लड़ा। उन्होंने कहा कि ऐसे हज़ारों उदाहरण हैं और कांग्रेस पार्टी खुद सुकुमार सेन, टी.एन. शेषन और एम.एस. गिल जैसी हस्तियों द्वारा शुरू की गई परंपरा को आगे बढ़ाती है।
दुबे ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक जवाब में कहा है कि सभी फैसले सामूहिक रूप से और ज़िम्मेदारी के साथ लिए गए थे।