शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 2019 के उस संशोधन कानून को रद्द कर दिया, जिसके तहत राज्य में OBC आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया गया था। नतीजतन, राज्य में OBC श्रेणी को अब केवल 14 प्रतिशत आरक्षण ही मिलेगा।
MP हाई कोर्ट ने 2019 के उस कानून को असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया, जिसने पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया था। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य में OBC श्रेणी केवल 14% आरक्षण की हकदार होगी। गौरतलब है कि 8 मार्च 2019 को कमलनाथ के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने आरक्षण में 13% की बढ़ोतरी की थी। अपने 159 पन्नों के आदेश में पीठ ने दोहराया कि OBC को 14% आरक्षण मिलेगा।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह ने बताया, "माननीय हाई कोर्ट के समक्ष राज्य सरकार के 8 मार्च 2019 को जारी अध्यादेश संख्या 2/2019 को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं थीं, जिसमें पिछड़े वर्ग के उम्मीदवारों के लिए सेवाओं में आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का प्रावधान था। आज इन याचिकाओं पर सुनवाई हुई और माननीय हाई कोर्ट ने 159 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि सभी संबंधित दस्तावेजों की जांच और सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, पिछड़े वर्ग के आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने को उचित ठहराने वाली कोई 'असाधारण स्थिति' या 'आपातकालीन परिस्थिति' नहीं पाई गई। इसलिए, कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पिछड़ा वर्ग सेवाओं में केवल 14 प्रतिशत आरक्षण का हकदार है।
" चयन प्रक्रियाएं बरकरार
एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह ने आगे बताया कि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2 सितंबर 2019 और 29 सितंबर 2022 के बीच आयोजित सभी चयन प्रक्रियाएं—जिनमें पिछड़े वर्ग के लिए 27% आरक्षण के आधार पर चयन किया गया था—उन्हें माननीय हाई कोर्ट ने बरकरार रखा है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इन अतिरिक्त पदों को अगले तीन भर्ती चक्रों में शामिल किया जाए। एक और बात साफ़ की गई कि अभी रोके गए 13% पदों को अनारक्षित श्रेणी से भरा जाना चाहिए, और इस पूरी प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर पूरा करने के निर्देश जारी किए गए।
2019 में कमलनाथ सरकार का फ़ैसला
यह पूरा विवाद 2019 का है, जब तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने OBC आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया था। इस फ़ैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई और मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। इसके बाद, मामले को संबंधित याचिकाओं पर संयुक्त सुनवाई और फ़ैसले के लिए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट वापस भेज दिया गया।
कुल आरक्षण 73% तक पहुँच जाता
याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में इस कानून को चुनौती दी थी, मुख्य रूप से यह तर्क देते हुए कि *इंद्रा साहनी* मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले के अनुसार, कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता। नतीजतन, OBC कोटा को 27% तक बढ़ाने से राज्य का कुल आरक्षण 73% हो जाता। वर्तमान में, मध्य प्रदेश में आरक्षण SC के लिए 16%, ST के लिए 20%, OBC के लिए 14% और EWS के लिए 10% है। गौरतलब है कि पिछले साल CM मोहन यादव ने भी कहा था कि मध्य प्रदेश सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27% आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध है।
OBC पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने क्या कहा? OBC पक्ष की ओर से पेश वकील पुष्पेंद्र शाह के अनुसार, "अंतिम फैसला यह है कि 27% OBC आरक्षण को रद्द कर दिया गया है। कोर्ट ने कहा है कि मध्य प्रदेश में इस समुदाय का पहले से ही पर्याप्त प्रतिनिधित्व है; इसलिए, 14% आरक्षण ही काफी है और उससे ज़्यादा कुछ भी अनावश्यक है। 13% कोटे को रोके रखने—और यह सवाल कि क्या यह OBC को मिलेगा या जनरल कैटेगरी को—के मामले पर इस फैसले ने स्थिति स्पष्ट कर दी है: 29 सितंबर, 2022 के बाद जारी किसी भी विज्ञापन या की गई नियुक्तियों के लिए, वे सीटें अनरिजर्व्ड कैटेगरी (सामान्य श्रेणी) को जाएंगी और 13% वाली लिस्ट के तहत नियुक्तियां भी उसी कैटेगरी से की जाएंगी।" शाह के अनुसार, सरकार OBC के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट जा सकती है; चूंकि यह सरकार का अपना ही कानून था, इसलिए उसे यह कदम उठाना चाहिए।