कांचीपुरम के एक व्यवसायी ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है। इसमें 'CJP' नेता सौरव दास के नेपाल से जुड़े होने के आरोपों की जांच की मांग की गई है। याचिका पर सुनवाई करते हुए, अदालत ने केंद्र सरकार, क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी और 10 अन्य लोगों को नोटिस जारी किया है।
मद्रास उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को एक नोटिस जारी किया है। यह नोटिस सौरव दास की नागरिकता की जांच और उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स को ब्लॉक करने की मांग वाली एक याचिका के जवाब में दिया गया है। यह याचिका कांचीपुरम जिले के एक व्यवसायी गणेश कुमार ने दायर की है। उन्होंने मांग की है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय को निर्देश दिया जाए कि वे 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के राष्ट्रीय सह-संयोजक योगेश शर्मा—जो 'सौरव दास' के नाम से जाने जाते हैं—और उनके माता-पिता की पृष्ठभूमि तथा अन्य विवरणों की तत्काल, विस्तृत और निष्पक्ष जांच करें। अपनी याचिका में गणेश कुमार का कहना है कि दास का संबंध नेपाल से होने का आरोप है, जिसकी जांच होनी चाहिए। उनका तर्क है कि अगर यह सच साबित होता है, तो "उन्हें हमारी सरकार या हमारी न्यायपालिका को उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं है।" उन्होंने दास पर न्यायपालिका के खिलाफ "अपमानजनक भाषा" का इस्तेमाल करने का भी आरोप लगाया है।
'उनका पासपोर्ट और आधार कार्ड रद्द किया जाए'
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि अगर सौरव दास दोषी पाए जाते हैं, तो उनका पासपोर्ट और आधार कार्ड रद्द कर दिया जाना चाहिए। कांचीपुरम जिले के गणेश कुमार द्वारा दायर इस जनहित याचिका (PIL) पर मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने सुनवाई की। अदालत ने केंद्र सरकार, क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी और 10 अन्य लोगों को नोटिस जारी कर छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। अपनी याचिका में गणेश कुमार ने यह भी मांग की है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को निर्देश दिया जाए कि वे "सौरव दास" के नाम से चल रहे ट्विटर और इंस्टाग्राम हैंडल को ब्लॉक करें। इसके अलावा, उन्हें न्यायपालिका और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के खिलाफ आगे कोई भी अपमानजनक बयान देने से रोका जाना चाहिए।
संविधान के अपमान का आरोप
गणेश कुमार ने यह भी मांग की है कि इन कानूनी कार्यवाही के दौरान, सौरव दास को न्यायपालिका के खिलाफ कोई भी मानहानिकारक, डराने-धमकाने वाली, अभद्र, अश्लील या अपमानजनक टिप्पणी करने से रोका जाए। इसमें विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और निचली अदालतों के जजों के खिलाफ की गई व्यक्तिगत टिप्पणियां शामिल हैं। यह रोक सभी मीडिया प्लेटफॉर्मों (सोशल मीडिया सहित) पर लागू होनी चाहिए—चाहे ये टिप्पणियां सौरव दास ने खुद की हों या उनके सहयोगियों, दोस्तों, एजेंटों या प्रतिनिधियों के माध्यम से की गई हों। गणेश कुमार ने कहा कि सौरव दास लगातार न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो अपने आप में संविधान का अपमान है।
फंडिंग की जांच की मांग
गणेश कुमार ने तर्क दिया कि अगर सौरव दास के कथित नेपाली मूल की जानकारी सच है, तो यह व्यक्ति—जिसकी पहचान योगेश शर्मा के रूप में हुई है—उसने जानबूझकर इन तथ्यों को छिपाया है और धोखाधड़ी से भारत में आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड और पासपोर्ट हासिल किया है। उसे न्यायपालिका के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल करने का कोई अधिकार नहीं है। राष्ट्रीय हित में, इस बात की गहन जांच होनी चाहिए कि उसने अपना आधार कार्ड और पासपोर्ट कैसे हासिल किया, और उसे फंडिंग कहां से मिल रही है। इसके अलावा, यह जांचना भी जरूरी है कि न्यायपालिका के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल करने के पीछे उसके क्या मकसद हैं। उन्होंने आगे कहा कि जवाबदेही तय करने के लिए, उन खातों की भी जांच होनी चाहिए जिनके जरिए उसे फंड मिला है।