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नदियों को जोड़ने के नाम पर बंदरगाह देने की साज़िश का लगाया आरोप
दौसा । देश के पीएम नरेन्द्र मोदी पर नदियों को जोड़ने के नाम पर अरबपतियों को बंदरगाह देने की साज़िश का आरोप लगाया है। मिली जानकारी के अनुसार पीकेएस लिंक परियोजना पर मध्यप्रदेश और राजस्थान राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा एमओयू होने पर किसान नेता हिम्मत सिंह ने बयान जारी कर बताया कि नदियों को जोड़ने का सपना अंग्रेजों ने भी 161 साल पहले देखा था। आज मोदी सरकार ब्रिटिश शासन का सपना साकार कर रही हैं।
दरअसल नदियों को आपस में जोड़ने का विचार 161 साल पुराना है। 1858 में ब्रिटिश सैन्य इंजीनियर आर्थर थॉमस कॉटन ने बड़ी नदियों के बीच नहर जोड़ने का प्रस्ताव दिया था। ताकि ईस्ट इंडिया कंपनी को बंदरगाहों की सुविधा मिल सके। उन्होंने पीएम से सवाल किया कि क्या मोदी जी भी नदियों को जोड़ने वाली परियोजना के तहत अपने कॉरपोरेट मित्रों को नदियों के ज़रिए नए बंदरगाह तो नहीं देना चाह रहे हैं? उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि नदियों को जोड़ने की साज़िश अन्तर्राष्ट्रीय भी हो सकती हैं। पानी से जुड़ी कंपनियां देश को बांटने की कोशिश कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि नदियों को जोड़ने की बहस तो अंग्रेजों से शुरू हुई और बाद में नेहरू के जमाने से चली आ रही है। लेकिन यह अब तक कारगर इसलिए नहीं हुई क्योंकि यह उपयोगी नहीं हैं। सतलज-यमुना जल विवाद का उदाहरण हमारे सामने है। इससे न राजस्थान को पानी मिला और न ही पंजाब को जलापूर्ति हो सकी। वहीं कावेरी जल विवाद भी आज तक नहीं निबटा। भारत में पानी पर तिहरा अधिकार है। इसमें नदियों में बहने वाले जल पर केंद्र सरकार का हक है। राज्य में बरसने वाले जल पर राज्य सरकार का हक है और तीसरा हक नगर निगम, पंचायतों का है। ऐसे में नदियों को आपस में जोड़ना लड़ाई कराने जैसा माहौल बनाना है।
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