'वंदे मातरम' के पूरे वर्शन को अनिवार्य रूप से गाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और सीनियर एडवोकेट एस. मुरलीधर के बीच तीखी बहस हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है कि क्या उन लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है जो धार्मिक मान्यताओं या अंतरात्मा की आवाज़ के कारण राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' गाने से इनकार करते हैं। कोर्ट ने साफ़ किया कि राष्ट्रीय गीत क्या होना चाहिए, यह तय करना उसका काम नहीं है; बल्कि वह केवल राष्ट्रीय गीत का अपमान करने पर सज़ा के प्रावधानों से जुड़े कानूनी पहलुओं की जांच करेगा।
यह याचिका संगीतकार टी.एम. कृष्णा ने दायर की है। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा ने 'राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971' में किए गए संशोधन को चुनौती दी। इस संशोधन के बाद, 'वंदे मातरम' गाने में जानबूझकर बाधा डालने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए तीन साल तक की जेल या जुर्माने का प्रावधान किया गया।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि संविधान लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता का अधिकार देता है; इसलिए, किसी को भी अपनी मान्यताओं के खिलाफ गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।
कोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई करते हुए, कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। कोर्ट ने शांतिपूर्वक गीत न गाने और जानबूझकर उसे गाने में बाधा डालने के बीच अंतर किया। कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को याचिका की एक कॉपी दी और केंद्र सरकार को इस मामले पर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया।
अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को तय की गई है।
सुनवाई के दौरान, *बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य* मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1986 के फैसले पर भी चर्चा हुई। उस मामले में, 'यहोवा विटनेस' (Jehovah's Witnesses) संप्रदाय के बच्चों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगान गाने से इनकार कर दिया था, लेकिन राष्ट्रगान बजने के दौरान वे सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे। उन्हें राहत देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही उन्होंने धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया, लेकिन सम्मानपूर्वक खड़े होने के उनके काम को अपने आप में अपमान का काम नहीं माना जा सकता। सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी पर तीखी बहस
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की एक टिप्पणी से कुछ देर के लिए माहौल तनावपूर्ण हो गया। मेहता ने कहा, "फैसले नक्सलियों की इच्छा के अनुसार नहीं लिए जाएंगे।"
याचिकाकर्ता के वकील एस. मुरलीधर ने इस पर आपत्ति जताई। अपनी टिप्पणी वापस लेने से इनकार करते हुए मेहता ने कहा कि उनका बयान...
"फैसले नक्सलियों के हिसाब से नहीं लिए जाएंगे," सॉलिसिटर जनरल ने SC में कहा; कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।