मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देश के बाद, अब मध्य प्रदेश में दो से ज़्यादा बच्चे होने पर भी सरकारी नौकरी मिल सकेगी। जैसे ही 25 साल पुराने इस नियम—जिसे मूल रूप से दिग्विजय सिंह ने लागू किया था—को रद्द किया गया, बीजेपी के आक्रामक विधायक रामेश्वर शर्मा ने कांग्रेस पर हमला बोला, जिससे बहस का रुख ही बदल गया।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के एक फैसले ने राज्य की राजनीतिक सरगर्मी को 45 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर पहुंचा दिया है। सीएम मोहन यादव के आदेश के तहत, अब दो से ज़्यादा बच्चे वाले लोग भी एमपी में सरकारी नौकरी के लिए पात्र होंगे। असल में, 2001 में दिग्विजय सरकार द्वारा लागू किया गया वह नियम—जिसमें दो से ज़्यादा बच्चे वालों को सरकारी नौकरी से रोका गया था—अब इतिहास बनने जा रहा है। खबर आते ही राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई, जिसमें जनसंख्या विस्फोट से लेकर हिंदू-मुस्लिम समीकरण और समान नागरिक संहिता (UCC) जैसे मुद्दे चर्चा का विषय बन गए।
**दिग्विजय सिंह का कानून रद्द**
मुख्यमंत्री के एक ही आदेश ने मध्य प्रदेश में राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। इस आदेश के बाद, सरकारी नौकरी की पात्रता के लिए बच्चों की संख्या को दो तक सीमित करने वाला प्रस्तावित प्रावधान लागू नहीं किया जाएगा। सीएम मोहन यादव ने सामान्य प्रशासन विभाग के उस मसौदा प्रस्ताव को रद्द करने का निर्देश दिया है, जिसमें दो से ज़्यादा जीवित बच्चे वाले उम्मीदवारों को सरकारी सेवा के लिए अयोग्य ठहराने की बात कही गई थी। सरकार इसे जनहित में उठाया गया कदम मानती है।
**बीजेपी नेता ने दिग्विजय सिंह पर क्या आरोप लगाया?**
2001 में, तत्कालीन कांग्रेस मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक नियम लागू किया था जिसके अनुसार 26 जनवरी 2001 के बाद दो से ज़्यादा बच्चे होने पर सरकारी कर्मचारी या उम्मीदवार सरकारी सेवा के लिए अयोग्य माने जाएंगे। 25 साल पुराने इस नियम को रद्द किए जाने पर, बीजेपी के आक्रामक विधायक रामेश्वर शर्मा ने कांग्रेस पर हमला बोला, जिससे बहस की दिशा पूरी तरह बदल गई। रामेश्वर शर्मा ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि यह नियम दिग्विजय सिंह की हिंदू-विरोधी साजिश थी।
**कांग्रेस का दावा: RSS का एजेंडा, हिंदू-मुस्लिम तनाव भड़काने की साजिश**
दिग्विजय सिंह का यह फैसला मूल रूप से जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर लिया गया था। बीजेपी का कहना है कि राज्य के युवा और कर्मचारी इस स्थिति का खामियाजा भुगत रहे थे। विपक्ष के नेता उमंग सिंघार और कांग्रेस का आरोप है कि यह बीजेपी का एजेंडा नहीं, बल्कि आरएसएस का एजेंडा है। कांग्रेस पूछ रही है कि रोजगार पोर्टल पर रजिस्टर्ड 22 लाख युवाओं को असल में नौकरी कब मिलेगी। वे सवाल उठा रहे हैं कि देश भर में हर साल 2 करोड़ नौकरियां पैदा करने के वादे का क्या हुआ। विपक्ष का आरोप है कि असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए 'हिंदू-मुस्लिम कार्ड' खेला जा रहा है।
**हजारों परिवारों को राहत**
इस राजनीतिक खींचतान के बीच, इस फैसले का स्वागत भी किया जा रहा है। मध्य प्रदेश में कर्मचारी संगठनों ने पिछले नियम को दिग्विजय सिंह द्वारा लाया गया "काला कानून" बताया है। इन संगठनों के अनुसार, सरकार के 58 में से 38 विभागों के हजारों कर्मचारियों पर नौकरी जाने का खतरा मंडरा रहा था और कई मामले सालों से अदालतों में अटके हुए थे। इस आदेश ने उन हजारों परिवारों को नई उम्मीद दी है।
**हिंदू संगठनों ने फैसले का स्वागत किया**
हालांकि, मामला सिर्फ नौकरी की राहत तक ही सीमित नहीं रहा। मोहन यादव के फैसले के बाद हिंदू संगठन भी मैदान में उतर आए हैं। इस कदम का स्वागत करते हुए उन्होंने एक नया और बेहद विवादित मुद्दा छेड़ दिया है। उनका तर्क है कि दिग्विजय सिंह का कानून हिंदू आबादी को कम करने की एक साजिश थी, क्योंकि पांच पत्नियों और 25 बच्चों वाले लोग इस नियम के दायरे से बाहर थे। हिंदू संगठन अब मांग कर रहे हैं कि सरकार जनसंख्या नियंत्रण का एक नया कानून लाए जिसमें चार बच्चों तक की अनुमति हो।
कुल मिलाकर, बच्चों की संख्या मध्य प्रदेश की राजनीति में एक नया विवाद का विषय बन गई है। जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए 25 साल पहले बनाया गया नियम अब हिंदू-मुस्लिम समीकरणों और आरएसएस के एजेंडे से जुड़े आरोपों की भेंट चढ़ गया है। सवाल यह है कि क्या मोहन यादव का "मास्टरस्ट्रोक" मध्य प्रदेश के युवाओं को नौकरी दिलाएगा, या राज्य की राजनीति को नए ध्रुवीकरण की आग में झोंक देगा?