नए 2023 कानून में सिलेक्शन कमिटी में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की जगह एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है। विपक्ष यह तर्क दे सकता है कि यह संविधान के 'बेसिक स्ट्रक्चर' का उल्लंघन करता है—खासकर, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का।
कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियां चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़कों पर उतर आई हैं। मंगलवार को इन पार्टियों ने कुमार के इस्तीफे की मांग और विरोध में एक मार्च निकाला। मार्च के दौरान, राहुल गांधी एक पोस्टर पकड़े हुए दिखे, जिस पर लिखा था, "ज्ञानेश, हो गया भाई।" पुलिस के रोकने पर, राहुल और प्रियंका ने आकाशवाणी भवन कॉम्प्लेक्स के अंदर आठ घंटे से ज़्यादा समय तक धरना दिया। प्रदर्शन के दौरान, प्रियंका तिरंगे के सामने खड़ी रहीं, और राहुल ने उन्हें एनर्जी ड्रिंक ऑफर की। विपक्ष पूरे दिन पूरे एक्शन मोड में दिखा।
चीफ इलेक्शन कमिश्नर के इस्तीफे की मांग को लेकर सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट हैं। हालांकि, इस्तीफे या विपक्ष की मांगों को लेकर ज्ञानेश कुमार की तरफ से अभी तक कोई बयान नहीं आया है। अब सवाल उठ रहे हैं कि अगर कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो विपक्ष के पास क्या कानूनी और संवैधानिक ऑप्शन हैं।
अगर ऐसा होता है, तो पूरा विपक्ष—जिसमें राहुल गांधी भी शामिल हैं—एक साथ आ सकता है और इसे एक बड़ा नेशनल मुद्दा बनाने के लिए कई लेयर वाली स्ट्रैटेजी अपना सकता है। पॉलिटिकल लामबंदी और संवैधानिक नियमों का फायदा उठाकर, विपक्ष खास संवैधानिक रास्ते अपनाने की तैयारी कर सकता है।
'जेल भरो' आंदोलन और लोगों का गुस्सा
अगर एडमिनिस्ट्रेटिव इस्तीफे की मांग पूरी नहीं होती है, तो विपक्ष विरोध को बड़े पैमाने पर सड़क आंदोलन में बदलने पर विचार कर सकता है। चुनाव आयोग के हेडक्वार्टर (निर्वाचन सदन) का घेराव करने, जंतर-मंतर पर रैलियां करने और NSUI और लेफ्ट-विंग स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन के ज़रिए 'जेल भरो' आंदोलन शुरू करने जैसी तैयारियां की जा सकती हैं। राहुल गांधी के मैसेज—"यह सिर्फ एक एडमिनिस्ट्रेटिव गलती नहीं है, बल्कि वोटों की चोरी और डेमोक्रेसी पर हमला है"—को सीधे जनता तक पहुंचाकर एक बड़े आंदोलन में बदलने की कोशिश की जा सकती है।
गैर-BJP पार्टियों को हर कीमत पर एकजुट होना चाहिए। इलेक्शन कमीशन की ऑटोनॉमी का मुद्दा ऐसा है जिस पर सभी विपक्षी पार्टियां सहमत हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों से लेकर क्षेत्रीय राजनीतिक दिग्गज पार्टियां विचारधारा के मतभेदों को किनारे रखकर, इस मुद्दे को उठाने के लिए एक कॉमन प्लेटफॉर्म पर आ सकती हैं और केंद्र सरकार और इलेक्शन कमीशन के खिलाफ एक नेशनल कैंपेन शुरू कर सकती हैं।
विपक्ष के पास क्या कानूनी ऑप्शन हैं?
अगर चीफ इलेक्शन कमिश्नर राजनीतिक दबाव के बावजूद अपने पद पर बने रहते हैं, तो भारतीय संविधान और न्याय व्यवस्था विपक्ष को कई कानूनी रास्ते देती है, जैसे:
संसद में इंपीचमेंट मोशन लाना।
संविधान के आर्टिकल 324(5) के तहत, चीफ इलेक्शन कमिश्नर को सिर्फ उसी प्रोसेस से पद से हटाया जा सकता है जो सुप्रीम कोर्ट के जज पर लागू होता है। जज (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत, कम से कम 100 लोकसभा MP या 50 राज्यसभा MP को स्पीकर या चेयरमैन को साइन किया हुआ नोटिस देना होगा।
एक बार मोशन मंज़ूर हो जाने के बाद, तीन लोगों की जांच कमेटी—जिसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज, एक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक जाने-माने कानून के जानकार शामिल होंगे—'गलत व्यवहार' या 'नाकाबिलियत' के आरोपों की जांच करेगी। कमेटी की रिपोर्ट में आरोपों की पुष्टि होने के बाद ही मोशन को संसद के दोनों सदनों में खास बहुमत से पास किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) या रिट पिटीशन फाइल करना।
विपक्ष आर्टिकल 32 का इस्तेमाल करके सीधे सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन फाइल कर सकता है। पिटीशन में यह तर्क दिया जाएगा कि वोटर लिस्ट से नाम हटाना या बिना सही प्रोसेस के नियमों में बदलाव करना नागरिकों के बुनियादी अधिकारों (आर्टिकल 19 और 21) और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।
विपक्ष कोर्ट से आग्रह कर सकता है कि वह चीफ इलेक्शन कमिश्नर को गंभीर आरोपों की जांच पूरी होने तक एडमिनिस्ट्रेटिव और पॉलिसी से जुड़े फैसले लेने से रोकने के लिए एक अंतरिम आदेश जारी करे।
**'CEC और दूसरे EC एक्ट, 2023' की संवैधानिकता को चुनौती**
विपक्ष एक नया केस फाइल कर सकता है—जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में पहले से पेंडिंग पिटीशन के साथ होगी—जिसमें इलेक्शन कमीशन के अपॉइंटमेंट प्रोसेस में किए गए बदलावों की वैलिडिटी पर सवाल उठाया जाएगा।
नया 2023 का कानून सिलेक्शन कमिटी में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की जगह एक केंद्रीय मंत्री को लाता है। विपक्ष यह तर्क दे सकता है कि यह संविधान के 'बेसिक स्ट्रक्चर'—खासकर, फ्री और फेयर इलेक्शन के प्रिंसिपल का उल्लंघन करता है।
आर्टिकल 14 और 324 का हवाला देते हुए, विपक्ष सुप्रीम कोर्ट से इलेक्शन कमीशन की पूरी ऑटोनॉमी और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए नई गाइडलाइंस जारी करने की रिक्वेस्ट करेगा।
**इलेक्शन कमीशन के 'मल्टी-मेंबर बॉडी' प्रिंसिपल को चुनौती**
संविधान के आर्टिकल 324 और कानून के तहत
...तय है।
विपक्ष यह साबित करने की कोशिश कर सकता है—अलग-अलग राज्यों के हाई कोर्ट में रिट याचिकाएं दायर करके—कि कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए बड़े पैमाने पर वोट हटाए गए थे।
अगर हाई कोर्ट को पता चलता है कि अधिकारियों ने प्रक्रिया से जुड़े नियमों का उल्लंघन किया है, तो वह खास प्रशासनिक दिशानिर्देशों को रद्द कर सकता है और राज्य-स्तर की समीक्षा प्रक्रिया पर रोक लगा सकता है, जिससे मुख्य चुनाव आयुक्त के कथित एकतरफा नियंत्रण पर रोक लग सकती है।